Yaadon Ka Safarnama by Shivjeet Singh Raghav

Yaadon Ka Safarnama by Shivjeet Singh Raghav

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Yaadon Ka Safarnam“जिंदगी सालों का सफर नहीं यादों का सफर है।”
ये संदेश देती है शिवजीत सिंह राघव की “यादों का सफरनामा।”

“यादों का सफरनामा” का विमोचन “इंडिया इंटरनेशनल सेंटर” से रविवार, 8 मार्च, 2015

जुलाई का महीना थाआसमान में हलके बादल छाए हुए थे और सुबह की ठंडी हवा चल रही थी। कुछ रात का नशा अभी तक बाकी था। मैं बड़े मजे में धीरे-धीरे दौड़ने लगा। अचानक ही पीछे से सिर पर किसी बड़ी भारी चीज की चोट लगी। तेज दर्द उठा और मैंने खुद को अंधेरे में घिरता हुआ सा महसूस किया। मैं सिर पकड़ कर नीचे गिरता चला गया और मेरी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। 24 जुलाई, 1980 की यह सुबह उजाला होते होते, कब अँधेरा हो गयामुझे इसका गुमान ही ना था।

4 अगस्त 1980। यह वह दिन है जबसे मेरी याद्दाश्त के पन्नों पर घटनाओं की स्याही से ईश्वर ने दोबारा लिखना मंजूर किया। 24 जुलाई से लेकर इस तारीख तक के पन्ने जैसे मेरी यादों की डायरी से किसी ने चुरा लिये हैं

हादसे में रीढ़ की हड्डी में चोट लगना, व्हीलचेयर पर आ जाना। बावजूद इसके शिवजीत ने फैसला किया की उन्हे किसी के सहारे जीवन नहीं जीना है...  आज इंडियन स्पाइनल इंजूरी सेंटर में कार्यरत, उन लोगों के लिए प्रेरणा और उम्मीद का स्त्रोत बन गए हैं जो इस तरह के हादसे से गुजरते हैं। उनकी किताब एक ऐसे शक्स की कहानी है जिसने जिंदगी में सभी रंग भरे हैं और उन्हे इस किताब में बखूबी ज़िंदा कर दिया है।

मैं साइकिल से उतर नहीं सकता था और दोस्त को छोड़ कर भी नहीं जा सकता था। अक्ल लगायी! मैंने उससे कहा कि वह एक बड़ा-सा पत्थर ढूँढ कर सड़क के किनारे रख देतब तक मैं सर्कस के कलाकार की तरह साइकिल वहीं घुमाता रहा। आखि़रकार उसने दो ईंटें ढूँढ कर एक-दूसरे के ऊपर जमा दीं और मैंने भी सपफलतापूर्वक ठीक उसी जगह साइकिल रोककर अपना पैर उन ईंटों पर जमा लिया।...

बचपन की शरारतों से शुरू होती शिवजीत की जिंदगी जवानी के जोश भरे दौर से गुजरते हुए हादसे का शिकार होती है और फिर जिंदगी और मौत के बीच की जद्दोजहद से निकल कर शिवजीत आगे की जिंदगी में खुद के लिए एक मुकाम पाते हैं। व्हीलचाइर के सहारे चलने वाला शक्स खुद दूसरों का सहारा बन जाता है।

आईबीएन-7 के ताज होटल में हुए प्रोग्राम के दौरान कुछ फिल्मी हस्तियाँ भी आयी हुई थींजिनमें सलमान ख़ान साहिब के अलावा सुभाष घई जैसे गणमान्य लोग थे। मैंने ट्रॉफी ग्रहण करते वक़्त दो-तीन शेर पढ़े थे। उनके जवाब में आशुतोष राणा साहिब ने एक शेर पढ़ाजो बहुत पसन्द आया।

नज़र को बदल दो नज़ारा बदल जाता है,
सोच को बदल दो सितारा बदल जाता है
,
और कश्ती बदलने की ज़रूरत नहीं है
,
दिशा को बदल दो किनारा बदल जाता है।

मैं मानता हूँ की जीवन में यादें ही सब कुछ हैं... हम मिट्टी से बने हैं मिट्टी में ही मिल जाएंगे अगर दुनिया को कुछ दे जाएंगे तो ‘यादें’। यादों का सफरनामा मेरी आज तक की जमा पूंजी है, मेरी यादें! 

शिवजीत सिंह राघव 


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